Thursday, March 31, 2011

इस्लाम की आधुनिक समस्याएं

 
         Irsad Manji
इरशाद मांझी      Dr.Santosh Rai

                    यह एक खुली चिट्ठी है मुसलमान  बिरादरी के लिए जो उनका ध्यान तवज्जो उस अंध्विश्वास की तरफ दिला रही है जो उन्हें कुरान और हदीस के कट्टर उलेमा और मुल्ला मस्जिदों और इस्लामी स्कूलों में सिखा रहे हैं जिसका नतीजा है कि वे दूसरे मतों  वाले लोगों के साथ मिल-जुल कर स्वाधीनता पूर्वक अपने अपने जीवन को व्यतीत करने में असमर्थ हैं और समय-समय पर दिया गया कत्ल और गारत का जिहादी पेशा कबूल करके पूरे मुस्लिम समाज को दुनिया की नजरों में गिरा रहे हैं और स्वयं खुद पस्ती की ओर जा रहे हैं। 
 
मेरा परिवार १९७२ में ईदी अमीन के डर से युगाण्डा छोड़ने पर विवश हो गया था क्योंकि अमीन दादा की पुकार थी कि अफरीका केवल काली नसल के लोगों के लिए ही है। मेरे परिवार ने ब्रिटिश कोलम्बिया में आकर शरण ली और वहां के स्वतंत्रा व समानता के वातावरण में जा कर महसूस किया कि किस प्रकार वे युगाण्डा में काली नसल के लोगों को छोटा मानते थे और उन्हें लूटते भी थे। बाईबल में ईसाई मत की कहानियां पढ़ीं तो पता लगा कि इस्लाम में ऐसी छूट नहीं है और यह स्वीकार किया कि केवल स्वतंत्र समाज में ही अपनी खोज व धर्म की उन्नति हो सकती है क्योंकि वहां पर विचारधारा पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं है मेरे पिता कठोर स्वभाव के और अपनी पत्नी व बच्चों के साथ सख्ती से पेश आते थे। मुसलमान शरणार्थियों ने जो मदरसे मस्जिदों में बनाए, उनमें लड़के-लड़कियों पर सख्ती से पेश आया जाता था और विभिन्न प्रकार की सीमाओं को सहना पड़ता था। वहां की सीखलायी थी कि यदि तुम वास्तव में मजहबी हो तो अपनी सोच को बन्द करके रखो और जो बताया जाए उसे निःसंकोच स्वीकार कर लो। इस्लाम की पहचान नामक पुस्तक का कहना था कि खुदा का हुक्म है कि दिन में पाँच बार नमाज पढ़ो। लेकिन स्त्रियों का मस्जिद में जाना वर्जित है। कुरान की भाषा अरबी है जिसे केवल बीस प्रतिशत मुसलमान ही जानते हैं। बिना समझे इसे तोते की तरह दोहराना ठीक नहीं। दूसरी भाषाओं में इसका अनुवाद अशुभ माना जाता है । मैं यह सोचती हूं कि उनके खुदा  ने खुशियों पर अंकुश क्यों लगा रखा है और रंगीन वस्त्र पहनने वाली महिलाओं को कैद किया जाता है और बलात्कार की सतायी महिलाओं को पत्थर मार-मार कर अपमानित किया जाता है। इस प्रकार का नीच व्यवहार केवल मुस्लिम समाज की ही धरोहर है। इस सबके बावजूद किसी को किसी प्रकार की कोई शिकायत करने की कोई स्वतंत्रता नहीं है। 

इस्लाम में यहूदियों के प्रति भरी घृणा-वृत्ति है । जबकि इस्लाम ईसाई मत व यहूदी मत एक ही पैगम्बर इब्राहिम के परिवार की देन है फिर जिहाद  क्यों। कुरान में कई बातों पर हाँ भी है और ना भी है। दुर्भाग्यवश इस्लाम की शिक्षा जबर जुल्म गरीबी व अकेलेपन की ओर अपने अनुयायी लोगों को ले जा रही है। कट्टरपंथी मुसलमान तबाही की बन्द गली की तरफ जा रहे हैं। कुरान इस्लाम के सिवाए किसी दूसरे मत को स्वीकारने से इन्कार करती है। क्या बाकी सारी दुनिया व उनके मत गलत हैं यदि वे इस्लाम से दुश्मनी नहीं रखते, यदि इस्लाम को सुधार की आवश्यकता है तो आज ही है क्योंकि सारी दुनिया आतंकवाद को इस्लाम की देन कहती है। मुसलमान की समस्या यह है कि वे कुरान के हर अक्षर को पत्थर की लकीर मानते हैं। अक्खड़ जाहिल व कम सोच वाले उलेमा व मुल्लाओं ने मुख खोलने पर रुकावट लगा दी है और क्या सच है इसकी पहचा नहीं हो सकती। दूसरे मतों में भी समय-अनुसार त्रुटियां पाई जाती हैं जिसके विषय में विचार-विमर्श किया जाता है। लेकिन ऐसा कर पाना इस्लाम के विरुद्ध है। जब मैनें ने इस्लामी पाठशाला में पूछा कि क्या कारण था कि हजरत मुहम्मद ने सब यहूदियों को मारने का आदेश दिया और स्त्री वर्ग को बराबर का दर्जा नहीं दिया। उसका कोई उत्तर नहीं मिला। मन में यह प्रश्न उठा कि क्या इस्लाम अपने साथ रख सकेगा। सन्‌ १९८९ में जब खुमैनी ने शैतानिक वर्सेज नाम की पुस्तक के लेखक सलमान रुशदी को कत्ल करने का फतवा ऐलान किया तो मुझे अधिक आश्चर्य हुआ कि इस्लामी नेता कितने नादान हैं। तीनों मतों का एक ही मालिक है लेकिन उनके लोगों के जीवन कितने अलग-अलग हैं। पैगम्बर मुहम्मद अरब  के लोगों को इब्राहिम के कुनबे से जोड़ना चाहते थे जिनको पहली भविष्यवाणी हुई थी। उनकी सन्तान में ही यहूदी ईसाई मत शुरू किए। अरब के मुसलमानों ने कोई नया परवरदिगार नहीं ढूंढ निकाला। उसको केवल मात्र अल्लाह का नाम देकर विभिन्न मत बना दिया। इस्लामी शिक्षा के अनुसार पहल इस्लाम की थी। उससे पहले अज्ञानता का अंधकार था। अरब का इस्लाम वहां के कबीलों के रीति-रिवाजों पर आधारित हुआ। सभी स्वतंत्र देशों में मस्जिदें बनाने पर किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं है। लेकिन अरब देशों में दूसरे मत का कोई स्थान नहीं है। 
टी.वी व संवाददाताओं के नाते मुझे इस्लाम से जुड़े बहुत से नाजुक प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता था। इजराइल व फलिस्तीन का भ्रमण करके मैंने दोनों पड़ोसी देशों की जनता के जीवन को बड़ी नजदीकी से देखा और उजाला व अन्धेरा पास-पास पाया। निजी जीवन में दाढ़ी मुंडवाने और महिलाओं को परदे में कैद रखने के विरुद्ध यदि कोई आवाज उठाता है तो वह अपनी मौत को पुकारता है। क्या यह एक अच्छे व्यक्ति की पहचान है कि वह आतंकवाद फैलाने में अपने अमूल्य जीवन की बलि दे देता है उनको मारने के लिए जिनसे उसकी कोई भी दुश्मनी नहीं। यदि हँसने पर भी रोक है तो कुरान की आयतों को ऊँची आवाज से क्यों पढ़ा जाता है। इस्लाम में नर का नर से और मादा का मादा से मिलाप एक अपराध माना जाता है। मनुष्यों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित रखना अनुचित है जबकि स्वर्ग  में सुन्दरियां और सुन्दर युवक उपलब्ध कराए जाते हैं । नाइजीरिया में एक युवती के साथ उसके पिता के तीन जानकारों ने बलात्कार किया। वहाँ की इस्लामी अदालत ने जबकि वह एक शिशु को जन्म देने वाली थी १८० कोड़े मारने की सजा दी। क्या यह इस्लाम का इन्साफ है जो मत और उसके नियम अरब के कबीली सभ्यता के लिए उचित थे क्या वे संसार भर के प्रगतिशील व मानवीय सिंद्धातों के अनुकूल हो सकते हैं 
जो मत दूसरे मतों के विरुद्ध घृणा का पाठ पढ़ाता हो और स्त्रियों को उच्च शिक्षा, सुन्दर वस्त्र पहनने, खेलकूद व मधुर संगीत से वंचित करे क्या वह परिवर्तन व विकास का मुहताज नहीं। मेरे इस्लाम के विद्वानो! इस पर गंभीरता से विचार करो और समय के अनुसार परिवर्तन लाओ। यह एक चेतावनी है, इस्लाम को मानने वालों के लिए जिससे वे नेक व सच्चे इन्सान बन कर स्वयं सुख से जिएं व दूसरों को भी जीने दें। मैं इस्लाम को प्रगति की राह पर चलते देखना चाहती हूं।  



2 comments:

सलीम ख़ान said...

aisa kuchh bhi nahi !

Anonymous said...

Salim aisa kuch bhi nahi hai to fir kaisa hai... muslims never comes out in open... becoz they are cruel and guilty, every muslim should stop eating non veg be honest... actully all muslims goes to hell after death but there is no one to tell them this fact