Sunday, March 17, 2013

मुलायम पुत्र के राज में हिन्‍दुओं पर कहर जारी है



डॉ0 संतोष  राय

अखिलेश राज में हिन्‍दुओं के बेटियों की इज्‍जत तार-तार हो रही है

 कासगंज, 0 प्र0। उत्‍तर प्रदेश में जबसे अखिलेश राज आया है तबसे मानो हिन्‍दुओं पर जुल्‍मों-सितम की एक बाढ़ सी आ गयी है। अखिलेश राज हिन्‍दुओं को मुगलकाल की याद ताजा कर रही है। 12 मार्च 2013 को शाम करीब 4 बजे एक हिन्‍दू बच्‍ची का निर्ममता पूर्वक बलात्‍कार किया गया। लड़की लहूलुहान होकर बेहोश हो गयी। उसे अस्‍पताल ले जाया गया जहां डॉक्‍टरों ने बलात्‍कार की पुष्टि कर दी। जिस युवक ने बलात्‍कार किया वो विशेष संप्रदाय का था। पीडि़त बच्‍ची एक मजदूर की बेटी थी, उसका बाप तम्‍बाकू के कारखाने में मजदूरी करके किसी तरह जीवन-यापन करता था। 

बलात्‍कार की यह घटना थाना पटियाली जिला कासगंज उत्‍तर प्रदेश का है।
पुलिस ने किसी तरह से एफ0 आई0 आर दर्ज करके मोहम्‍मद मुवीन सैफी नाम के आरोपी को गिरफ्तार कर लिया, आरोपी की गिरफ्तारी पर मुसलमानों ने जमकर हंगामा बरपाया। मगर मौलवियों व मुल्ला अखिलेश यादव की पुलिस ने मीडिया को फटकने तक नही दिया। बलात्‍कार के आरोपी मुवीन सैफी की उम्र 25 साल है। अदालत में सैकड़ों मुसलमान आरोपी बलात्‍कारी को बचाने आ गये थे। मुवीन सैफी की नजर पीडि़ता के दूसरे एक और बहन जिसकी उम्र 10 वर्ष की थी उस पर थी मगर वो घटना के दिन कही अन्‍यत्र गयी हुयी थी। इसलिये मुवीन सैफी ने उस 5 साल की मासूम हिन्‍दू बच्‍ची की इज्‍जत को तार-तार कर दिया।

ज्ञात रहे कि 15 मार्च 2012 को मुल्‍ला मुलायम के सुपुत्र अखिलेश यादव ने यूपी की बागडोर संभाली थी और शपथ ली थी कि वो उत्‍तर प्रदेश की तस्‍वीर बदल देंगे। उन्‍होंने कहा था कि प्रदेश अपराध मुक्‍त होगा। मगर उनकी इस शपथ के सिर्फ 100 दिन बाद यानी कि 26 जून 2012 तक के आंकड़ों पर ध्‍यान दें तो यूपी में बलात्‍कार की 1164, हत्‍या की 370 , लूट के 920 और अपहरण के 356 मामले सामने आये।

अब चुकि उनकी सरकार 365 दिन पूरा कर लिया है तो सारे आंकड़ों को तीन गुना कर देना चाहिए। अखिलेश राज में हिन्‍दुओं पर अत्‍याचार की एक आंधी आ गयी है। मुसलमानों का दुस्‍साहस काफी बढ़ गया है। हिन्‍दुओं को ऐसा लग रहा है मानों मुगलकाल के औरंगजेबी शासन में जी रहे हैं।
पीड़िता की हालत अब भी नाजुक है और में लगातार वहां के डाक्टर के संपर्क में हूँ और पल-पल की जानकारी मिल रही है !

Wednesday, March 6, 2013

हराम और हलाल इस्लाम का कमाल !


डॉ0 संतोष राय

सभी लोग अच्छी तरहसे जानते हैं कि भारत के मुसलमान हमेशा "वन्देमातरम " का विरोध करते हैं . और कहते हैं कि ऐसा बोलना हराम है .यानि पाप है .इस्लाम में जायज -नाजायज ,वैध -अवैध अर्थात हलाल और हराम की बड़ी विचित्र और तर्कहीन अवधारणा है ,जो कुरान ,हदीसों ,और मुफ्तियों द्वारा समय समय पर दिए फतवों के आधार पर तय की जाती है . जिसे मानना हर मुसलमान के लिए अनिवार्य होता है . वर्ना उसे काफ़िर समझा जाता है .इसलिए मुसलमान हमेशा हर विषय हराम और हलाल के आधार पर ही तय करते हैं , चाहे वह देश के संविधान या कानून के विरुद्ध ही क्यों न हो .वह विना समझे अंधे होकर उसका पालन करते हैं .
इस संक्षिप्त से लेख में कुरान ,हदीसों ,फतवों ,और समाचारों में प्रकाशित खबरों से चुन कर एक दर्जन ऐसे मुद्दे दिए जा रहे हैं , जिनको पढ़ कर प्रबुद्ध पाठक ठीक से समझ जय्र्गे कि इस्लाम के अनुसार हराम क्या है ,और हलाल क्या है .
1 -अल्लाह का नाम लिए बिना जानवर को मारना हराम है .
लेकिन जिहाद के नाम से हजारों इंसानों का क़त्ल करना हलाल है .

2-यहूदियों ,ईसाइयों से दोस्ती करना हराम है .
लेकिन यहूदियों ,ईसाईयों का क़त्ल करना हलाल है .
3-टी वी और सिनेमा देखना हराम है .
लेकिन सार्वजनिक रूप से औरतों को पत्थर मार हत्या करते हुए देखना हलाल है .
4-किसी औरत को बेपर्दा देखना हराम है .
लेकिन किसी गुलाम औरत को बेचते समय नंगा करके देखना हलाल है .
5-शराब का धंदा करना हराम है .
लेकिन औरतों ,बच्चों को गुलाम बना कर बेचने का धंदा हलाल है .
6-संगीत सुनना हराम है .
लेकिन जिहाद के कारण मारे गए निर्दोष लोगों के घर वालों की चीख पुकार सुनना हलाल है .
7घोड़ों की दौड़ पर दाव लगाना हराम है .
लेकिन काफिरों के घोड़े चुरा कर बेचना हलाल है
8-औरतों को एक से अधिक पति रखना हराम है .
लेकिन मर्दों लिए एक से अधिक पत्नियाँ रखना हलाल है .
9-चार से अधिक औरतें रखना हराम है .
लेकिन अपने हरम में सैकड़ों रखेंलें रखना हलाल है .
10किसी मुस्लिम का दिल दुखाना हराम है .
लेकिन किसी गैर मुस्लिम सर कटना हलाल है .
11-औरतों के साथ व्यभिचार करना हराम है .
लेकिन जिहाद में पकड़ी गयी औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार करना हलाल है .
12-जब किसी औरत की पत्थर मार कर हत्या की जारही हो ,तो उसे बचाना हराम है .
जब उसी अपराध के लिए औरत को जिन्दा जलाया जा रहा हो ,तमाशा देखना हलाल है .
इन थोड़े से मुद्दों को ध्यान से पढ़ने से उन लोगों की आँखें खुल जाना चाहिए तो इस्लाम को शांति का धर्म समझ बैठे हैं .इसलिए "भंडाफोडू " ब्लॉग पिछले चार सालों से अपने प्रमाण सहित लेखों के माध्यम से देश प्रेमी लोगों को इस्लाम से सचेत करता आया है . ताकि भूले से भी कोई व्यक्ति जकारिया नायक जैसे धूर्त के जाल में नहीं फसे .जिनको भी इस लेख के सम्बन्ध में इस्लामी किताबों के प्रमाण चाहिए वह "भंडाफोडू " के सभी लेख पढ़ने का कष्ट करें .
ऐसे कमाल के तर्कहीन इस्लाम से जितनी दूरी बनाये रखोगे उतने ही निरापद रहोगे !!

http://www.faithfreedom.org/Articles/AyeshaAhmed20729.htm

आप इस आर्टिकल को  यहां भी पढ़ सकते हैं: भंडाफोडू


Friday, February 22, 2013

हिन्दू महासभा के नाम पर अवैध संगठन चलाने पर दिल्ली उच्च न्यायलय ने अवमानना का संज्ञान लिया !




विदित हो की दिल्ली उच्च न्यायलय की खंडपीठ ने एल. पी. ए. नं0 522/2011 पर हिन्दू महासभा की केंद्रीय उच्चाधिकार समिति की याचिका पर अपना निर्णय दिया था की स्वामी चक्रपाणी व अन्य अपने आपको राष्ट्रीय पदाधिकारी नहीं कह सकते ! इस निर्णय के पश्चात भी स्वामी चक्रपाणी व चन्द्र प्रकाश कौशिक अपने आपको राष्‍ट्रीय  अध्यक्ष एवं इनके सहयोगी अपने आपको स्वयंभू राष्‍ट्रीय  पदाधिकारी घोषित कर प्रशासन एवं राष्ट्र को कई वर्षों से दिग्भ्रमित कर रहे थे ! इसके खिलाफ केंद्रीय उच्चधिकार समिति के अध्यक्ष डॉ संतोष राय ने दिल्ली उच्च न्यायलय में अपने अधिवक्ता श्री अवधेश कुमार सिंह के माध्यम से अपराधिक मनोवृत्ति व भू‍माफिया, जो अखिल भारत हिन्दू महासभा के स्वंभू व अवैध राष्ट्रीय पदाधिकारी समाचार पत्रों के माध्‍यम से घोषित कर रखा था,  के खिलाफ न्यायलय की अवमानना का वाद डाला

 कल वाद संख्या 104/2013 डॉ संतोष राय बनाम चन्द्र प्रकाश कौशिक व अन्य पर माननीय न्यायमूर्ति जे. एस. सिस्‍तानी  ने न्यायलय की अवमानना की नोटिस पांच लोगों के खिलाफ स्वीकार कर जारी किया, जिसमे चन्द्र प्रकाश कौशिक, मुन्ना कुमार शर्मा, विरेश त्यागी, स्वामी चक्रपाणी तथा डॉ इंदिरा तिवारी हैं ! अधिवक्ता श्री अवधेश कुमार सिंह के तर्कों से प्रभावित कर तथा कागजाती साक्ष्यों के आधार पर 17 अप्रैल 2013 को माननीय न्यायमूर्ति ने नोटिस जारी करते हुए जबाब देने का तिथि निश्चित किया !

Tuesday, January 15, 2013

मुसलमानों के अधिकार का औचित्य !


डॉ0 संतोष राय

विश्व के हरेक व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार मिलना चाहिए . सभी इस बात पर सहमत होंगे . परन्तु इस बात से भी सभी लोग सहमत होंगे अधिकारों का जन्म कर्तव्य से होता है .सिर्फ जनसख्या कम होने के आधार पर ही अधिकारों की मांग करना तर्कसंगत नहीं है . सब जानते कि मुसलमानों ने सैकड़ों साल तक इस देश को लूट लूट कर कंगाल कर दिया . लोगों की भलाई की जगह मकबरे , कबरिस्तान , मजार और मस्जिदें ही बनायी है . और जब हिदू देश की आजादी के लिए शहीद हो रहे थे ,तो इन्हीं मुसलमानों ने देश के टुकडे करवा दिए . फिर भी अल्पसंख्यक होने का बहाना लेकर अधिकारों की मांग कर रहे हैं . आप एक भी ऐसा मुस्लिम देश बता दीजिये जहाँ अल्पसंख्यक होने के आधार पर गैर मुस्लिमों को वह अधिकार मिलते हों ,जो मुसलमान यहाँ मांग रहे हैं . मुसलमान हमेशा दूसरों के अधिकार छीनते आये हैं और आपसी मित्रता ,सद्भाव , भाईचारे की आड़ में पीठ में छुरा भोंकते आये हैं यह इस्लाम के इतिहास से प्रमाणित होता है , मुसलमान अपनी कपट नीति नहीं छोड़ सकते , कैसे कुत्ते की पूंछ सीधी नहीं हो सकती ,

1-मुसलमानों की कपट नीति
अरब के लोग पैदायशी लुटेरे , और सतालोभी होते हैं .मुहम्मद की मौत के बाद ही उसके रिश्तेदार खलीफा बन कर तलवार के जोर पर इस्लाम फैलाने लगे . और जिहाद के बहाने लूटमार करने लगे , यह सातवीं शताब्दी की बात है , उस समय मुसलमानों का दूसरा खलीफा "उमर इब्ने खत्ताब " दमिश्क पर हमला करके उस पर कब्ज़ा कर चुका था . उम्र का जन्म सन 586और 590 ईस्वी के बीच हुआ था और मौत 7नवम्बर 644 ईस्वी में हुई थी . चूंकि यरूशलेम दमिश्क के पास था ,और वहां बहुसंख्यक ईसाई थे . यरूशलेम स्थानीय शासन "पेट्रीआर्क सोफ़्रोनिअसSophronius  " (Σωφρόνιος ) के हाथों में था . ईसाई उसे संत (Saint ) भी मानते थे .यरूशलेम यहूदियों ,ईसाइयों और मुसलमानों के लिए पवित्र शहर था . और उमर बिना खूनखराबा के यरूशलेम को हथियाना चाहता था . इसलिए उसने एक चाल चली . और यरूशलेम के पेट्रआर्क सन्देश भेजा कि इस्लाम तो शांति का धर्म है . यदि आप के लोग समर्पण कर देगे तो हम भरोसा देते है कि आपकी और आपके लोगों के अधिकारों की रक्षा करेंगे .और इसके साथ ही उमर एक संधिपरत्र का मसौदा ( Draft ) यरूशलेम भिजवा दिया . जिस पर यरूशलेम के पेर्ट्रीआर्क ने सही कर दिए . और उमर पर भरोसा करके यरूशलेम उमर के हवाले कर दिया .

2-उमर का सन्धिपत्र
इस्लामी इतिहास में इस संधिपत्र को " उमर का संधिपत्र ( Pact of Umar ) या " अहद अल उमरिया  العهدة العمرية " कहा जाता है .इसका काल लगभग सन 637 बताया जाता है . उमर ने यह संधिपत्र "अबूबक्र मुहम्मद इब्न अल वलीद तरतूशأبو بكر محمد بن الوليد الطرطوش"  " से बनवाया था .जिसने इस संधिपत्र का उल्लेख अपनी प्रसिद्ध किताब " सिराज अल मुल्क  سراج الملوك" के पेज संख्या 229 और 230 पर दिया है .इस संधिपत्र का पूरा प्रारूप " एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी University of Edinburgh  " ने सन 1979 में पकाशित किया है .इस संधिपत्र की शर्तों को पढ़ने के बाद पता चलेगा कि मित्रता के बहाने मुसलमान कैसा धोखा देते हैं . और अल्पसंख्यकों को अधिकार देने के बहाने उनके अधिकार छीन लेते है . यद्यपि उमर ने इस्लाम को शांति का धर्म बता कर लोगों गुमराह करने के लिए इस संधिपत्र बड़ा ही लुभावना शीर्षक दिया था

3-इस्लामी शासन में गैर मुस्लिमों का अधिकार !
यद्यपि उमर का संधिपत्र सातवीं सदी में लिखा गया था लेकिन सभी मुस्लिम देश इसे अपना आदर्श मानते है . और हरेक मुस्लिम देश के कानून में उमर के संधिपत्र की कुछ न कुछ धाराएँ जरुर मौजूद है ,उमर के संधिपत्र का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है ,
1-हम अपने शहर में और उसके आसपास कोई नया चर्च ,मठ , उपासना स्थल , या सन्यासियों के रहने के लिए कमरे नहीं बनवायेंगे . और उनकी मरम्मत भी नहीं करवाएंगे . चाहे दिन हो या रात
2-हम अपने घर मुस्लिम यात्रियों के लिए हमेशा खुले रखेंगे , और उनके लिए खाने पीने का इंतजाम करेंगे
3-यदि कोई हमारा व्यक्ति मुसलमानों से बचने के लिए चर्च में शरण मांगेगा ,तो हम उसे शरण नहीं देंगे
4-हम अपने बच्चों को बाईबिल नहीं पढ़ाएंगे
5-हम सार्वजनिक रूप से अपने धर्म का प्रचार नहीं करेंगे , और न किसी का धर्म परिवर्तन करेंगे .
6-हम हरेक मुसलमान के प्रति आदर प्रकट करेंगे , और उसे देखते ही आसन से उठ कर खड़े हो जायेंगे . और जब तक वह अनुमति नहीं देता आसन पर नहीं बैठेंगे .
7-हम मुसलमानों से मिलते जुलते कपडे ,पगड़ी और जूते नहीं पहिनेंगे
8-हम किसी मुसलमान के बोलने ,और लहजे की नक़ल नहीं करेंगे और न मुसलमानों जैसे उपनाम (Surname ) रखेंगे
9-हम घोड़ों पर जीन लगाकर नहीं बैठेंगे , किसी प्रकार का हथियार नहीं रखेंगे , और न तलवार पर धार लगायेंगे
10-हम अपनी मुहरों और सीलों ( Stamp ) पर अरबी के आलावा की भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे
11-हम अपने घरों में सिरका (vinegar ) नहीं बनायेंगे
12-हम अपने सिरों के आगे के बाल कटवाते रहेंगे
13-हम अपने रिवाज के मुताबिक कपडे पहिनेंगे ,लेकिन कमर पर "जुन्नार" ( एक प्रकार का मोटा धागा ) नहीं बांधेंगे
14-हम मुस्लिम मुहल्लों से होकर अपने जुलूस नहीं निकालेंगे , और न अपनी किताबें , और क्रूस प्रदर्शित करेंगे , और अपनी प्रार्थनाएं भी धीमी आवाज में पढेंगे
15-यदि कोई हमारा सम्बन्धी मर जाये तो हम जोर जोर से नहीं रोयेंगे , और उसके जनाजे को ऐसी गलियों से नहीं निकालेंगे जहाँ मुसलमान रहते हों . और न मुस्लिम मुहल्लों के पास अपने मुर्दे दफनायेंगे
16 -यदि कोई मुसलमान हमारे किसी पुरुष या स्त्री को गुलाम बनाना चाहे ,तो हम उसका विरोध नहीं करेंगे
17-हम अपने घर मुसलमानों से बड़े और ऊँचे नहीं बनायेंगे

" जुबैरिया बिन कदमा अत तमीमी ने कहा जब यह मसौदा तैयार हो गया तो उमर से पूछा गया , हे ईमान वालों के सरदार , क्या इस मसौदे से आप को संतोष हुआ , तो उमर बोले इसमें यह बातें भी जोड़ दो ,हम मुसलमानों द्वारा पकडे गए कैदियों की बनायीं गयी चीजें नहीं बेचेंगे . और हमारे ऊपर रसूल के द्वारा बनाया गया जजिया का नियम लागू होगा " बुखारी -जिल्द 4 किताब 53 हदीस 38

4-पाकिस्तान में हिन्दुओं के अधिकार

पाकिस्तान की मांग उन्हीं मुसलमानों ने की थी जो अविभाजित भारत के उसी भाग में रहते थे जो अज का वर्त्तमान भारत है .पाकिस्तान बनाते ही जिन्ना ने कहा था आज से पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों द्वार सील हो गया है "the fate of minorities in this country was sealed forever "
पाकिस्तान में इसी लिए अकसर आये दिन हिन्दू लड़कियों पर बलात्कार होता है , मंदिर तोड़े जाते हैं , बल पूर्वक धर्म परिवर्तन कराया जाता है .और हमारी हिजड़ा सेकुलर सरकार हिना रब्बानी के साथ मुहब्बत के तराने गाती रहती है . दिखने के लिए पाकिस्तान के संविधान की धारा 20 में अल्पसंख्यकों के अधिकारों का दावा किया गया है . लेकिन मुसलमान संविधान की जगह उमर की संधि पर अमल करते हैं .
हम लोगों से पूछते हैं , सरकार मुसलमानों को अधिकार किस खजाने से देगी ? क्या सोनिया इटली से खजाना लाएगी ?सीधी सी बात है कि मुसलमानों को अधिकार हिन्दुओं से छीन कर दिया जायेगा .
और अब समय आ गया है कि हिन्दू अपना अधिकार इन लुटेरों को देने की बजाये इन छीन लें . तभी देश की गरीबी दूर हो जाएगी औए आतंकवाद भी समाप्त हो जायेगा . क्योंकि हमारे ही पैसों से हमारा ही नाश हो रहा है .
हिन्दुओ अपनी अस्मिता बचाओ , अपने अधिकार छीन लो , अभी उठो !

http://www.bible.ca/islam/islam-kills-pact-of-umar.htm

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मुस्लिम कट्टरता को पाल-पोष रहे हैं तथाकथित सेकुलर


बलबीर पुंज


भारतीय जवानों के साथ की गई बर्बरता के बाद पाकिस्तान की ओर से उकसाने वाली गतिविधियां निरंतर जारी हैं। जम्मू-कश्मीर स्थित भारत-पाक सीमा के मेंढर सेक्टर में दो भारतीय सैनिकों की जिस नृशंसता से हत्या की गई, वह जिहाद प्रेरित पाशविक मानसिकता को रेखांकित करती है। भारतीय जवानों के साथ हुई क्रूरता के बीच लश्करे-तैयबा के सरगना हाफिज सईद का पाक अधिकृत कश्मीर में उपस्थित होना महज संयोग नहीं है। अजमल कसाब को फांसी दिए जाने के बाद से ही पाक प्रायोजित आतंकी संगठनों की ओर से बदला लेने की धमकी दी जा रही थी। विडंबना यह है कि स्वयं अपने देश में भी एक वर्ग ऐसा है, जो इसी विषाक्त मानसिकता से ग्रस्त है। सेक्युलर राजनीतिक दल और सेक्युलर मीडिया का एक बड़ा भाग ऐसी देशघाती मानसिकता को अपना मौन समर्थन देते हैं।

24 दिसंबर को हैदराबाद के चंद्रायनगुट्टा निर्वाचन क्षेत्र से मजलिसे-इत्तेहादुल मुसलमीन पार्टी के विधायक अकबरूद्दीन ओवैसी ने हजारों लोगों की उन्मादी भीड़ को संबोधित करते हुए जैसी बातें कीं, वे एक समुदाय विशेष के बड़े वर्ग में मौजूद भारत की सनातन संस्कृति और अस्मिता के प्रति घृणा की ही पुष्टि करती हैं। ऐसे लोगों के पास पासपोर्ट तो भारत का है, परंतु निष्ठा सीमा पार है। 24 दिसंबर से 1 जनवरी तक किसी ने भी ओवैसी के विषवमन का संज्ञान तक नहीं लिया। ओवैसी ने एक घंटे से भी अधिक समय तक घृणा भरा भाषण दिया, जिसमें भारत की सनातन सभ्यता, हिंदू समाज और उनके मान बिंदुओं का सरेआम अपमान किया गया। यह किसी एक सिरफिरे व्यक्ति का प्रलाप मात्र नहीं है। यह हजारों लोगों की भीड़ के आगे एक चुना हुआ जनप्रतिनिधि बोल रहा था। उसके शब्दों के समर्थन में हजारों लोगों की भीड़ उन्माद में मजहबी नारे लगा रही थी। ओवैसी ने विवादित ढांचा ध्वंस को लेकर 1993 के मुंबई बम धमाकों को न्यायोचित ठहराते हुए अजमल कसाब को दी गई फांसी पर भी प्रश्न खड़ा किया। इसके अलावा उसने टाडा में जेल में बंद मुस्लिम युवकों के प्रश्न पर भारतीय व्यवस्था व न्याय प्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए। मुंबई हमलों के लिए टाइगर मेमन आदि पर हुई कार्रवाई और कसाब की फांसी पर भी उसे आपत्ति है। इस देश की संप्रभुता पर हमला करने वाले आतंकियों के प्रति ओवैसी और उसके समर्थकों की हमदर्दी समझ से परे नहीं है। मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन की स्थापना ही हैदराबाद रियासत में निजामत को बनाए रखने के लिए हुई थी। भारत विभाजन के दौरान हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय से इनकार कर दिया था। तब भारतीय व्यवस्था और हिंदुओं के खिलाफ निजाम के संरक्षण में रजकरों ने युद्ध छेड़ा था, जिसका संचालन इसी संगठन ने किया था। देशद्रोही गतिविधियों के कारण ही इस संगठन को 1948 में प्रतिबंधित किया गया था। आज उस संगठन के लोग ऐसी विषैली भाषा में बात करें तो आश्चर्य कैसा?

भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) में रहने वाले 99 प्रतिशत लोग या तो हिंदू हैं या मतांतरण से पूर्व हिंदू थे। फिर क्या कारण है कि अधिकांश मतांतरित अपनी ही भूमि से पुष्पित और पल्लवित सनातन संस्कृति से न केवल दूर हो गए, बल्कि उसे समूल नष्ट करने के लिए प्रतिबद्ध हैं? विभाजन से पूर्व पाकिस्तान वाले भूभाग में 22 प्रतिशत हिंदू-सिख थे, आज वहां उनकी आबादी एक प्रतिशत से भी कम है। बांग्लादेश में तब 30 प्रतिशत आबादी गैर मुस्लिम थी, जो अब आठ प्रतिशत से भी कम रह गई है। क्यों? क्यों इस्लामी देशों में गैर मुस्लिमों को मजहबी स्वतंत्रता नहीं है? क्यों गैर मुस्लिमों को मजहबी उत्पीड़न और अत्याचार के कारण पलायन कर भारत में शरण लेने या इस्लाम कबूल करने के लिए विवश होना पड़ रहा है? पाकिस्तान द्वारा भारत को हजार घाव देकर उसे नष्ट करने का घोषित एजेंडा, ओवैसी का भारत व हिंदू विरोधी विषवमन और मुंबई जैसे जघन्य कांड इसी बीमार मानसिकता की उपज हैं।

वस्तुत: ओवैसी जैसे पाकिस्तानपरस्त समय-समय पर भारत और भारत की सनातनी संस्कृति के खिलाफ जो विषवमन करते हैं, वह सेक्युलरवाद के नाम पर पोषित किए गए इस्लामी कट्टरवाद की ही तार्किक परिणति है। कितना बड़ा विरोधाभास है कि भारत में सेक्युलरवाद के पुरोधा वामपंथी दलों के राजनीतिक और बौद्धिक समर्थन के कारण मजहबी अवधारणा पर आधारित कट्टरवादी पाकिस्तान का जन्म हुआ। इन्हीं वामपंथियों ने पूर्ववर्ती निजाम की छत्रछाया में भारत और हिंदू विरोधी रजाकारों को भी समर्थन दिया। स्वाधीनता के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने पूरे समाज की विकृतियों को निशाना नहीं बनाया। 1956 में हिंदू कोड बिल बनाकर सामाजिक सुधारों को केवल हिंदुओं तक ही सीमित रखा और इससे मुस्लिमों को वंचित रख उन्हें कट्टरपंथियों के रहमोकरम पर छोड़ दिया। क्यों? सन 1986 में जब सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो मामले में एक आदेश देकर मुस्लिम समाज में सुधार का मार्ग खोला तब तात्कालिक प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद में अपने बहुमत का दुरुपयोग करते हुए उस निर्णय को ही पलट दिया। चाहे बाटला हाउस मुठभेड़ का मामला हो या 1998 का कोयंबटूर बम विस्फोट, आज भी तथाकथित सेक्युलर नेता मुसलमानों के उदारवादी वर्ग के साथ खड़े होने में संकोच करते हैं और आतंकवादियों के साथ खड़े नजर आते हैं। इन विकृतियों पर मीडिया के एक बड़े वर्ग व तथाकथित सेक्युलर दलों की खामोशी इस कट्टरवादी मानसिकता को पुष्ट करने का काम करती है। कोई राष्ट्रवादी संगठन यदि सेक्युलरवाद के नाम पर पोषित इस्लामी कट्टरवाद का विरोध करे तो उसे बहुलतावाद, प्रजातंत्र और पंथनिरपेक्षता के मूल्य सिखाए जाते हैं, सड़कों पर सेक्युलरिस्टों-मानवाधिकारियों का कुनबा प्रदर्शन करता है। क्यों?

नवंबर, 2008 में मुंबई में पाकिस्तान प्रायोजित दहशतगर्दी, पाकिस्तान द्वारा हजार घाव देकर भारत को नेस्तनाबूद करने का इरादा, ओवैसी का हैदराबाद में विषाक्त भाषण, हाल ही में दो भारतीय सैनिकों के साथ बर्बरता, हाफिज सईद द्वारा भारत में रक्तपात की धमकियां; ये सब सतह पर अलग-अलग घटनाएं हैं, परंतु इन सबके पीछे एक साझी विषैली मानसिकता है, जिसने 1947 में भारत को खंडित होने के लिए विवश किया और जिसको तब से लेकर आज तक तथाकथित सेक्युलर दलों का सहयोग या मौन समर्थन प्राप्त है। तथाकथित सेक्युलरवादी दलों के खाद-पानी के बिना मुस्लिम कट्टरवाद की यह विषबेल इस देश में कभी इतनी लंबी नहीं पनप सकती थी।


Friday, January 11, 2013

पुराना है यह नफरत का नासूर


के  विक्रम राव



जरा मुलाहिजा हो उन सूक्तियों का जिन्हें हैदराबाद पुलिस ने अपनी प्राथमिकी (एफआईआर) में दर्ज कराया है और समाचार चैनलों तथा सोशल मीडिया ने मय वीडियों के रिकॉर्ड किया है.

उवाचक हैं आल इंडिया मजलिसे इत्तिहादे मुसलमीन के माननीय विधायक अकबरुद्दीन ओवेसीजिन पर सांप्रदायिक कटुता फैलाने व देश के खिलाफ जंग छेड़ने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं. उनकी पार्टी सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की गत नवम्बर तक घटक थी और आंध्रप्रदेश की कांग्रेस सरकार की समर्थक रही. कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि ऐसे कथनों पर भी पुलिस ने अकबरुद्दीन को गिरफ्तार क्यों नहीं किया. मुकदमा कायम क्यों नहीं किया.

इतना सब होने के बाद भी शायद किरण रेड्डी की सरकार हरकत में न आती, यदि मीडिया का दबाव न पड़ता. इसका कारण भी है. मजलिस के सात विधायक कांग्रेस सरकार की विधानसभा में डांवाडोल स्थिति में मदद कर सकते हैं. तेलंगाना का विरोधी हाने के कारण मजलिस पृथक राज्य के आंदोलनकारियों के खिलाफ सरकार की संकटमोचक बन सकती हैं. आगामी राज्यसभा मतदान में मदद दे सकती है. सबसे ज्यादा यही कि वाईएसआर कांग्रेस के जगनमोहन रेड्डी का साथ देने से मजलिस को रोका भी जा सकता है. अर्थात प्रदेश कांग्रेस शासन अकबरुद्दीन से अधिक लाभान्वित होती. उसे नाराज करके किरन रेड्डी क्यों बैल को बुलायें?

इन राजनीतिक हालात में कांग्रेस की विवशताओं को अकबरुद्दीन जानते हैं. इसीलिए तेवर चढ़ा रहे हैं. इसीलिए पुलिस को बाधित कर दिया गया. वर्ना पुलिसिया तहकीकात का भान होते ही अकबरुद्दीन लंदन जाकर आराम न फर्माते. हैदराबाद लौटकर वे मेडिकल कालेज मे भर्ती हो गए, जो हर संपन्न अपराधी का आम चलन हो गया हैं. आखिर आंध्रप्रदेश पुलिस की अपनी जवाबदेही भी है. पानी नाक तक पहुंचने के पूर्व उसने विधायक को कैद कर लिया. मुकदमा जब भी चले.

इस अकबरुद्दीन के प्रकरण से दो तथ्यों पर गौर करना होगा. पहला तो यही कि फिर एक बार चंद हिंदुओं का वैचारिक ढकोसला और व्यावहारिक चालाकी उजागर हो गई. इन सेक्युलरजनों ने अकबरुद्दीन की समता वरुण गांधी, प्रवीण तोगड़िया, मोहन भागवत के बयानों से किया. मानों दो बुरी बातें मिलकर एक अच्छाई बन जाती हों. गणित का फामरूला यही कहता हैं. लेकिन तर्क यही है कि इन हिंदू अग्रणियों की आलोचना, र्भत्सना और विरोध कई जाने-माने हिंदू लोगों ने खुलकर और जमकर की है.

बिना किसी हिचक अथवा लाग-लपेट के. मगर छह महीने हो गए, एक भी इस्लामी तंजीम या गणमान्य मुसलमान नेता ने अकबरुद्दीन की निंदा नहीं की. अलबत्ता जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति नवाब जंग साहब ने जरूर उंगली उठाई कि इतने वीडियो मिलने के बाद भी हैदराबाद पुलिस को अकबरुद्दीन के खिलाफ कार्रवाई में इतना विलंब क्यों हुआ? हिंदू और मुसलमान की समता करने वाले लोग घूर्तता से अथवा फिर जानकर एक प्रभावी तथ्य को नजरअंदाज कर देते हैं. धर्म के झंझटों से औसत हिंदू दूर ही रहता है. उस पर न कोई फतवा लागू होता है और न कोई मजहबी दबिश ही.
स्पष्ट है कि जिस दिन भारत का बहुसंख्यक कट्टर हो जाएगा, उसी दिन लाल किले पर भगवा परचम लहराएगा. महात्मा गांधी का यही श्रेष्ठतम योगदान रहा है, समन्वित भारतीय सोच की रचना में. यह उदार मजहबी गुण अल्पसंख्यकों में जिस दिन प्रस्फुटित होगा, देश में सच्ची गंगा-जमुनी संस्कृति ईमानदारी से उभरेगी. इस त्रासद तथ्य को अकबरुद्दीन सरीखे खल पुरुष भलीभांति जानते हैं. और इसका लाभ उठाते हैं. वर्ना आदिलाबाद की सभा में इस विधायक ने राम जन्मभूमि पर संदेह व्यक्त करते हुए यह न कहा होता कि कौन जाने कौशल्या कहां-कहां घूमी है और किस जगह राम पैदा हुए? तुर्रा यह कि अकबरुद्दीन की इस घिनौनी तकरीर पर उसके चालीस हजार श्रोतागण ताली पीटते रहे थे.

इससे भी ज्यादा पीड़ादायक तथ्य यह है कि सोनिया कांग्रेस के नेताओं ने अपनी प्रदेश सरकार को समय रहते सचेत नहीं किया कि हिंदुओं का भी यदा-कदा आदर किया करें.

अब सवाल उठता है कि पुलिस हरकत में कब और कैसे आई? राज्य शासन ने कोई भी निर्देश नहीं दिया कि अकबरुद्दीन के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए. विगत छह महीनों से वह तेलंगाना के जिलों में हिंदुओं के खिलाफ विषवमन करता रहा. अंतत: के करुणासागर नामक वकील ने 28 दिसम्बर, 2012 के दिन नामपल्ली अदालत में इस मुस्लिम विधायक के घोर सांप्रदायिक बयानों का संज्ञान लेने और मुकदमा कायम करने की अर्जी लगाई. पंद्रह दिन हुए इस अदालती निर्देश के जिसका पालन पुलिस को करना पड़ा.

जांच अधिकारी ए रघु ने तब लिखा कि अकबरुद्दीन के कई भड़काऊ भाषण रिकॉर्ड पर हैं. वे सांप्रदायिक विग्रह बढ़ाते हैं, इसके प्रमाण पर्याप्त है. इस विधायक के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी किया जा सकता है. उसे गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया जा सकता है. इतना सब होते हुए भी अकबरुद्दीन को काफी समय मिल गया कि वे हाईकोर्ट से राहत पाने की कोशिश कर लें. लंदन की सैर कर आएं.

यूं तो मियां अकबरुद्दीन ओवेसी खुद को हबीबे मिल्लत कहते हैं, मगर मासूम अनपढ़ मुसलमानों को नमाज, मजहब, कुरआन शरीफ की आड़ में बरगलाते खूब हैं. चारमीनार इलाके के पास चंद्रायन गुट्टा के झुग्गी-झोपड़ी में गुर्बत और बीमारी से ग्रसित पसमांदा मुसलमानों के वोट पर सियासत करने वाले अकबरुद्दीन हैदराबाद के सबसे आलीशान और महंगे इलाके बंजारा हिल्स की हवेली में वास करते हैं.
जायजाद और जमीन कब्जाने के मामले में अकबरुद्दीन पर बिल्डर मोहम्मद पहलवान ने मई, 2011 के दिन तीन गोलियां चलाई थीं. वे जान बचाकर भागे. उर्दूभाषी पत्रकार इस विधायक की बेजा हरकतों को उजागर करते रहे हैं. मगर सोनिया कांग्रेस की सरकार का वरदहस्त उसे मिला हुआ हैं. अकबरुद्दीन गुलबर्गा मेडिकल कॉलेज पढ़ने गए थे मगर दो साल में ही छोड़ आए. बजाय डॉक्टर बनकर मरीज का उपचार करने के, वे जहरीली फिरकापरस्ती वाली सियासत में जमकर समाज को बीमार बना रहे हैं. यह घिनौनी सांप्रदायिक विरासत अकबरुद्दीन को मजलिस की परंपरा के मुताबिक मिली.

मजलिस की स्थापना निजाम ओस्मान अली ने 1927 में की थी. तभी यह स्पष्ट हो गया था कि हैदराबाद की रियासत दक्षिण भारत में मुस्लिम कट्टरवादियों का केंद्र बनेगी. मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग की यह इकाई पाकिस्तान की रचना में सक्रिय रही. आजादी मिलने के चंद महीनों में ही हैदराबाद रियासत पाकिस्तान में शामिल होना चाहती थी. मगर सरदार वल्लभभाई पटेल ने निजाम का अलग राज्य का सपना खत्म कर हैदराबाद को भारतीय संघ का प्रदेश बना लिया. मजलिस को प्रतिबंधित कर दिया. मगर नेहरू कांग्रेस ने मजलिस को फिर मान्यता दे दी. आज वह फुंसी एक फोड़ा बन गई हैं. अकबरुद्दीन उसके नासूर बन गए हैं, जो सेक्युलर गणराज्य में रिसते रहे हैं. फिर भी कुछ लोग है जो इतना सब बर्दाश्त करते हैं, ताकि गंगा-जमनी तहजीब बनी रहे.

साभार: राष्‍ट्रीय सहारा