Friday, July 1, 2011

बापू ने कहा वेटिकन की 'दलाल' सोनिया कर रही है ईसाई प्रचार के लिए संतो के खिलाफ षड्यंत्र :


प्रस्‍तुति-डॉ0 संतोष राय

India Against Congress



रायपुर में संत आशाराम बापू ने भी सोनिया गाँधी को "सोनिया मैडम भारत छोडो" कह कर जोरदार लताड़ा, परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज, पूज्य संत आशाराम बापू के हमलो से कांग्रेसी तिलमिला उठे है, और साधू संतो को राजनीती में दखल नहीं देना चाहिए, ये उनका काम नहीं है आदि आदि अनर्गल बाते कह रहे हैं |सत्ता या राजनैतिक दलो से जुड़े इन तर्कवीरो को शायद इतिहास का ज्ञान नहीं है भारतीय इतिहास में कल्याणकारी व्यवस्था को स्थापित करने में साधू-समाज की भूमिका न केवल वैचारिक अपितु योद्धा की भी रही है | इतिहास गवाह है जब भी असुरी शक्तियों ने उत्पात मचाया है, जनता के धन को खाया है, अत्याचार किये है, दमन चक्र चलाया है, तब-तब कोई न कोई साधू संत परशुराम की तरह फरसा ले कर मानव कल्याण के लिए आगे आया है |इतिहास पर नजर दौडाए तो स्वामी दयानंद के शिष्य श्रद्धानंद का अंग्रेजी हुकूमत से टकराना साधू-धर्म के साथ-साथ देश-धर्म के लिए मर-मिटने का यदि मानक उदाहरण है तो स्वामी विवेकानंद का 'दरिद्रनारायण' की स्थापनार्थ किया गया कर्म, साधू-धर्म का पालन करते हुए देश-धर्म का निर्वाह और शोषित-दलित वर्ग को जागृत करने का अनूठा प्रयास था | स्वामी विवेकनद जी व्यक्तित्व,विचारो और क्रांतिकारी दर्शन का प्रभाव सुभाषचंद्र बोस के रूप में दिखाई देता है, जिन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य में आंखिरी किल ठोकी |चार्वाक,अगस्त्य मुनि, गुरु गोरखनाथ, कबीर, ईसा मसीह, गौतम बुद्ध ने साधुकर्म के साथ-साथ देश-धर्म और मानव-धर्म का भी पालन किया |
'
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप होय नरक अधिकारी' कहकर संत तुलसीदास ने भी निरंकुश और अत्याचारी शासको का विरोध किया |वही भक्ति धर्म को निबाहते हुए बिहारी ने तात्कालिक शासको का विरोध किया था | भ्रत्प्रहरी ने तो साधू-धर्म के साथ-साथ राज-धर्म को भी संचालित किया था |सिक्खों के प्रथम गुरु नानक ने बाबर जैसे क्रूर और अत्याचारी की अनीतियो का विरोध कर समाज में फैले विमानस्य के बिच सदभाव के सन्देश दिए |गुरु हरिराय ने औरंगजेब को सबक सिखाया गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब की क्रूरता का मुखरता से विरोध किया | गुरु गोविन्द सिंह ने ईश्वरीय भक्ति के साथ ही तत्कालीन अत्याचारी शासको से युद्ध करने में भी नहीं चुके | खालसा पंथ के संस्थापक गुरूजी ने मुगलों से लोहा लिया और सत्ता से टकराने के जज्बे में अपने चार पुत्र का बलिदान भी दिया था ,उनके शिष्य बन्दा बैरागी भी जालिम शासको से युद्ध करते हुए शहीद हुए |यहाँ कहने का आशय यह है की जब-जब सत्ताधीश निरंकुश हुए है तब-तब साधू और संतो ने भी योग-धर्म, गुरु-धर्म, साधू-धर्म का पालन करने के साथ ही राष्ट्र-धर्म का भी निर्वहन करने में कोई हिचक महसूस नहीं की | अत: स्वामी रामदेव जी को राजनीति पर ना बोलने और उनका विरोध करने वालो को इतिहास के पन्नो पर भी जाना चाहिए


1 comment:

Er. Diwas Dinesh Gaur said...

अब मायनों को देश छोड़ना ही पड़ेगा...देश में संतों ने विद्रोह कर दिया है...यह भारत के लिए शुभ संकेत हैं...
परन्तु हम सोनिया को आसानी से भागने नहीं देंगे...उसने जो किया है, उसे उसका दंड अवश्य मिलेगा...