Tuesday, March 29, 2011

Loan Waiver Scheme for Christian converts

The State has been witnessing an unprecedented scale of relief measures under the present Government, said Minister of Welfare of Scheduled Castes/ Scheduled Tribes and Backward Classes A.K. Balan.
In his address at the inauguration of the loan waiver scheme, undertaken by the Kerala State Development Corporation for Christian Converts from Scheduled Castes and the Recommended Communities Ltd. here on Thursday, Mr. Balan said the current loan waiver scheme would write off Rs.159 crore and this would benefit nearly one lakh people, mostly belonging to the poorest sections of the society, he said.
“This government has been, wholeheartedly, supportive of those who have been deprived of their basic needs and the State has led the way in terms of relief measures for the poorer sections of the society,” added Mr. Balan.
Under the debt waiver scheme for the Christian Converts, loans up to Rs.25,000 maturing on 31 March 2006 would be written off fully. In cases where the loan amount exceeds the stipulated amount, penal interest part would be written off, providing the persons with an opportunity to avail a one time benefit.
V.N. Vasavan, MLA, in his presidential address, highlighted the efforts of the State Government in protecting the needy. Commending the initiatives of the Government, Archbishop Vattappara of the Anglican Church of India requested those who avail the relief measures to reduce dependency on the assistance and to fully utilize the opportunities provided to improve living standards.
Non-liability certificates were distributed to the debt-ridden during the function.
The event was also attended by Jose K. Mani, MP, District Panchayat President T.N. Rameshan and Municipal Chairperson Bindu Santhosh Kumar

Courtsey:The Hindu
LinkL:http://beta.thehindu.com/news/states/kerala/article451983.ece

अल्लाह हमें रोने दो


लेखिका - जहांआरा बेगम
अनुवादक - स्वामी अमृतानन्द  ओमकारेश्वर महादेव  आर. वी. देसाई मार्ग  बड़ौदा 
प्रस्‍तुतिः डॉ0 संतोष राय
 
ओ अल्लाह तुम तो हमें अकेले में चीखने दो और जोर जोर से रोने दो । कहीं एकान्त में हमारा दम ही न निकल जाए । बुरके की घुटन में लोक जीवन की चारदीवारी में हमें इतना जी भर के रो लेने दो कि हमारी आखों में एक भी आंसू बाकी न बचे । हमें इतना रोने दो कि उसके बाद रोने की ताकत ही न रहे । क्यों केवल एक ही अधिकार तुमने मुसलमान महिलाओं के लिए छोड़ा है । पूरे मुस्लिम संसार में उलट पुलट हो रहे हैं पर हम मुसलमान तो वही पुराने ढर्रे पुराने संस्कारों की बेड़ियों में जकड़े हुएहैं । पूरे संसार की नारियों के लिए मुक्ति आंदोलन चले और आज वह स्वतंत्रता के मुक्त वातावरण में सांस ले रही हैं । परन्तु वाह रे हमारा भाग्य! मुस्लिम समाज की महिलाओं की मुक्ति का एक भी स्वप्न संसार के किसी कोने से नहीं फूटा । हमारी मुक्ति के लिए कोई भी समाज सुधारक चिन्तक कोई नेता व कोई भी धार्मिक व्यक्ति आगे नहीं आया । या अल्लाह ! कितना अदभुत है हमारा मुस्लिम समाज जिसमें कोई शरत चन्द्र पैदा नहीं हुआ जो हमारे आसुंओं का हिसाब चुकता कर दे । बदरूद्दीन तैयबजी हमीद दलवई आदि प्रसिद्ध विद्वानों ने गो हत्या बंद हो इस पक्ष में निबंध लिखे परन्तु हमारे लिए सहानुभूति का एक भी अक्षर हलक से नहीं फूटा । अब्दुल जब्बार ने हिजड़ों के दुख के बारे में तो एक मोटी पुस्तक लिख डाली परन्तु हमारे लिए एक भी शब्द उनके शब्दकोष से नहीं फूटा । सैय्यद मुस्तफा सिराज ने तो लिख ही डाला कि हिन्दू समाज अपने लोगों के दोषों और त्रुटियों को लेकर स्वतंत्रता पूर्वक लिख सकते हैं परन्तु हम लोग अपने समाज के बारे में लिखने से डरते हैं । हमारे विचारक भी मुस्लिम मुल्ला  मौलवियों से डरे हुए  सहमें हुए से एक शब्द भी नहीं कह पाते । खासतौर से एक मुस्लिम विवाह कानून को लेकर अगर कुछ ने लिखना भी शुरु कर दिया जैसे कि नरगिस सत्तार साहब की हमें आषा की एक किरण फूटती सी दिखाई तो दी पर अफसोस ! उसके वाद फिर वही घोर अंधकार , गहरी काली स्याही व एक लंबी चुप्पी । पिछले कई सालों से संसार के कई हिस्सों में कई परिवर्तन हुए । विवाह कानून में कई तब्दीलियां हुई कई नई वैज्ञानिक खोजों और चिन्तनों ने पुराने रूढ़ियों को छोड़ने को मजबूर कर दिया लेकिन मुस्लिम समाज वही पुरानी रूढ़िवादियों मे अटका हुआ है । लाहौर में सहस्रों स्त्रियों महिला कानून विदों ने जब मुस्लिम महिलाऒं के अधिकारों को लेकर जुलूस निकाला तो पुरूष पुलिस ने भयंकर लाठी चार्ज करके उसे भंग कर दिया । एक बार भारत की पारलियामैन्ट में मुस्लिम महिलाऒं के अधिकारों को लेकर डीबेट रखी गयी। ए डी एम के की पार्टी के मुस्लिम सांसदों द्वारा इस प्रश्न को उठाया गया पर मुस्लिम वोट खो देने के भय से देश की सब राजनैतिक पार्टियों को सांप सूंघ गया । सबके सब गूगें बहरे हो गए । क्या अजीब जीव है अल्लाह  यह राजनैतिक पार्टी के नेता व कार्यकर्ता । ऐसा लगता है जैसे इन सबकी जुबान को लकवा मार गया हो । 
ओ अल्लाह ! यह राजनैतिक पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता सुल्तानों के बनाए हुए खोजीयों हिजड़ों से भी नीच व निकृष्ट जीव हैं । खोजी लोग वह होते थे जो सुल्तानों द्वारा उनकी काम वासनाओं को पूरा करने के लिए सुन्दर स्त्रियों के बीच रहते हुए भी उनका भोग नहीं कर सकते थे । उन सुंदर स्त्रियों को देख कर वह मजबूरी में मन मसोस कर रह जाते थे क्योंकि हरम की स्त्रियों को बुरी नजर से देखना उनकी मौत का न्यौता देने के बराबर होता था । ऐसे ही आज के नेता केवल दिखावे के लिए समाज सुधारक बनते थे अन्दर से उनकी निगाहें स्त्रियों के बदन को निहारती रहती है । यदि वे मुस्लिम स्त्रियों कि उत्थान की बात भी करते हैं तो केवल छलावा मात्र होता है । करके दिखाने की शक्ति उनमें नाम मात्र की भी नहीं होती है । इसलिए आज मुस्लिम स्त्रियों का आकुल क्रंदन चालू है । और शायद युगयुगान्तर तक रहेगा । यह राजनैतिक तुच्छ जीव ऊंची आवाज में मधुर मधुर सुन्दर महान शब्दों मे स्वाधीनता  साम्यता व समान अधिकारों जैसे शब्दों का प्रयोग तो करते हैं परन्तु वह वोटों के लालची मुस्लिम स्त्रियों के उत्थान में एक एक भी पग नहीं उठाते । वाह कितनी सुन्दर शब्दावली का प्रयोग करते हैं मानों आज ही मुस्लिम स्त्री समाज की नैया पार लगा देगें । परन्तु उनके भाग्य में तो आंसू के दरिया में डूबना ही लिखा है । आंसू ही उनका भाग्य है जैसे संसार का तीन हिस्सा पानी है और एक हिस्सा पृथ्वी है ऐसा ही मुस्लिम समाज की महिलाओं का जीवन गर्दन तक आंसुओं में डूबा है । हिम्मत तो देखिए पुरूष समाज का ८० वर्ष का शेख कांपते हुए सिर वाला डगमगाते हुए कदमों वाला घर में ५ बीबियां होते हुए भी भारत में आ रहा है केवल १३ % १४ वर्ष की लड़की से विवाह रचाने और वह लाचार लड़की पुरुषों द्वारा संचालित समाज में न चाहते हुए भी बूढ़े खूंसट के साथ अरब देश में पहुंच जाती है । इस प्रकार की दिल दहला देने वाली घटनाओं । आए दिन समाचार पत्रों में पढ़कर मुस्लिम महिलाओं की रूह कांप जाती है पर बेचारगी पर आंसू बहाने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं । मुस्लिम महिला की घुटन भरी जिन्दगी ऐसी खबरों को पढ़ कर घर के अन्धेरे कोनों में सुबक कर रोने में ही बीत जाती है । कोई एक भी तो उनकी नहीं सुनता उनकी सिसकियों भरी आवाज । न घर में न घर के बाहर न भाई न पिता न मस्जिद न मुल्ला मौलवी न नेता न समाज सुधारक सब के सब मौन । कोई भी तो मौलवी ऐसी घटना के विरुद्ध फतवा जारी नहीं करता । उल्टा पाशविक धार्मिकता की आड़ में स्त्री तो पुरुष के पांव की जूती,  बच्चा पैदा करने वाली मशीन पुरुष की भोग्या ऐसी धारणाओं की बलिवेदी पर परवान हो जाती है । चार पांच सौतों के साथ जीवन कितना नारकीय बन जाता है यह तो केवल भोगने वाला ही जान सकता है । किसी मौलवी का जिहाद ऐसी कुप्रथा के विरुद्ध क्यों नहीं चलता उल्टा मुल्ला साहिब इसको मुता विवाह का नाम देकर अपना धार्मिक कर्मकाण्ड करता है । यह मुता विवाह है क्या  केवल थोड़े समय के लिए शादी फिर तलाक तलाक तलाक । असंख्य अस्वस्थ रहन सहन,  दारिद्र,  अशिक्षा ने हमारे समाज को उजाड़ बना दिया है । भेड़ बकरी और जानवरों के समान हमारी जिन्दगी बीबियों के बीच प्रायः धक्का मुक्की  केश केशी व जूतमपैजार होती ही रहती है । मियां साहब अगर घर में हो तो बात ही क्या  दोनों की ही ढोर ( जानवरों ) के समान पिटाई होती है । और उसके बाद तीसरी को लेकर मियां साहब दरवाजा बन्द करके अपने सोने वाले कमरे में पहुंच जाते हैं । हे अल्लाह ! ऐसा कैसा जीव बदा है तुमने हमारे लिए । 
प्रेम  तो हमारे जीवन में कभी आता ही नहीं है । प्रकाश की एक किरण कभी देखी नहीं । प्यार का उदाहरण तो बेगम मुमताज में ही देख पाते हैं जिसकी याद में अपूर्व शिल्पकला युक्त ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था । उसी बेगम की मृत्यु तेरह संताने पैदा करने के बाद जब संतान धारण करने के ताकत न रहने के बाद भी गर्भधारण करना पड़ा तो अंतिम संतान के जन्म में मौत के आगोश में सो गयी । यह है मुस्लिम बादशाह के प्यार का अनोखा ढंग । अब तुम ही बताओं ऐ अल्लाह ! जहां शहजादियों के प्रेमी या प्यारी बेगमों की यह हालत है तो हम जैसी साधारण मुस्लिम महिलाओं का तो कहना ही क्या  हमारे प्यार के पैमाने को तुम ही नाप सकते हो अल्लाह ! तलाक वाली तीखी धार तलवार महिलाओं के सिर पर कब आ गिरे कुछ कहा नहीं जा सकता अगर कही पान में चूना लगाने में तनिक देरी हो जाए तो तलाक की तलवार से कब कत्ल होना पड़े कुछ भरोसा नहीं । मियां जी की मन की मौज उनकी मर्जी से मजाक में भी तीन बार तलाक कह देने से सालों साल का विवाहित जीवन कब बिखर जाए कुछ कहा नहीं जा सकता । ऐसे तलाक का परिणाम छोटे बच्चे मां के प्यार से विहीन नन्हें मुन्ने बिलखते हुए बच्चे स्वास्थ्य से रहित उपेक्षा व अनादर का जीवन जीते जीतेकब आतंकियों की जमात में चले जाते हैं पता ही नहीं चलता । अन्य समाजों मे ऐसा नहीं होता यह बात नहीं है पर धर्म के नाम पर वहां ऐसा नहीं होता । मौलवी लोग मियांओं को इस प्रकार का उपदेश देते हैं कि बच्चे पैदा करके फायदा उठाओ संख्या बढ़ाओ और देश व्यवस्था में अव्यवस्था फैलाओ । पर अल्लाह ! उनके पागलपनें की धुन को सहन करते हैं हम मां बनकर । विवाहित मुस्लिम स्त्री कभी खाली नहीं रहती या तो गोद में या गर्भ में एक न एक बच्चा रहेगा । शीलहीन स्वास्थ्यहीन होकर विचित्र जिन्दगी जीनी होती है उसे हम लोग पड़ोस में ही हिन्दू नारियों की जिन्दगी देखते ही रहते हैं । अहा ! कितनी पवित्रता शुचिता प्रेम और विश्वासपूर्ण जीवन जीती हैं । पर हमारे जीवन में पवित्रता व सतीत्व के अवसर ही कहां हैं  तलाक के बाद अगर मियां जी को पश्चाताप हो तो घर में बीबी को रख नहीं सकते क्योंकि इस्लाम की शरीयत का पंजा अड़ाकर मौलवी लोग मार्ग अवरुद्ध कर देगें । यदि वह लड़की वापिस अपने पति के पास लौटना चाहे और पति रखनाचाहे तो एक नयी यातना झेलनी होगी । फिर एक दूसरे मियां के साथ शादी रचाए उस शादी के तीन दिन व तीन रात घृणामय दाम्पत्य जीवन बिताने के बाद वह महिला पवित्र होगी व कुवारी मानी जाएगी । फिर यदि वह मियांजी कृपा करके तलाक की भीख देगें तो ही पूर्व पति उसे ग्रहण कर सकता है । अगर कहीं लड़की खुदा की दया से सुंदर हो तो बहुतों का मन बदल जाता है और तलाक नहीं देते और परिणामस्वरूप खूना खानी तक हो जाती है । ऐसा है हमारा जीवन । ओ अल्लाह ! किसे कहें  किससें बोले अपनी व्यथा  यदि विवाह करें तो भंयकर सजा मिले शिकायत करें तो मुखालफत । 
इस पृथ्वी के समस्त धर्मों में कौमार्य ब्रह्‌मचर्य  पवित्रता आदि की मान्यता है परन्तु हमारे यहां नहीं । हमारे समाज में बहुशिक्षित मुसलमान तो हैं और इन बातों को वे जानते भी हैं परन्तु मजा लूटने के लोभी वे भी है इसीलिए कोई भी इसके विरोध में कुछ नहीं कहता । अधिक आधुनिक शिक्षित जो हैं वे हिन्दू समाज के आसपास चक्कर काटते रहते हैं वे भी हमारी सुध लेने की जरूरत नहीं समझते शायद इससे ही हमारी तरफ देखकर काजी अब्दुल ओद्ध ने एक बार कह डाला कि चौदह सौ वर्षों के इतिहास में इस्लाम मानव सभ्यता के अन्धकार में एक छोटा सा चिराग भी न जला सका और आबू सय्‌यद समग्र जीवन रवीन्द्र की चर्चा करते रह गए । इसी प्रकार एमसी छागला  उपराष्ट्रपति हिदायतुल्लाह सिकन्दर बख्त डा. जिलानी सैय्‌यद सुजतबा अली आदि जो हमारे समाज में मनुष्यता में श्रेष्ठ हुए वे सब इस मुस्लिम समाज से किनारा करते मुक्त हिन्दू समाज के निकट ही रहने लगे । इसी कारण हम मुस्लिम महिलांए मुल्ला मौलवी के शासन के अधीन अन्धकार भरा जीवन जीते हुए भर्राए हुए ह्‌रद्य सेरुदन भरा व असहनीय यातनाओं भरा जीवन जीने के लिए रह गयीं । कोई साहित्यकार अथवा पत्रकार हमारे जीवन के कष्टमय अन्त स्थल में नहीं झांक सका कोई हमारे दुखद आसुंओं को नहीं देख पाया किसी ने कोई किस्सा कहानी या निबन्ध नहीं लिखा । भारत सरकार ने हमें वोट देने का अधिकार तो दिया परन्तु हमारी सुधि लेने के लिए कोई कार्य नहीं किया जिससे हमारा जीवन शांति से व्यतीत हो सके । हिन्दू नारियों के लिए हिन्दू कोड बिल पास करके उनको सुख पूर्वक रहने का अधिकार मिल गया पर हमारे लिए कुछ भी ऐसा नहीं किया गया । हमारे समाज ने कोई भी तब्दीली मुस्लिम विवाह पद्धति में नहीं की है । मार्क्सवादियों के ऊपर भरोसा था पर उन्होंने भी हमारे लिए कुछ नहीं किया जबकि तजाकिस्तान उज्बेकिस्तान तुर्कमानिस्तान आदि देशों में मुस्लिम स्त्रियां मार्क्सवादी शासन में मुक्त हो गयी हैं । अब अरब देशों से आकर कोई शेख उन्हें खरीदने की जुर्रत नहीं कर सकता । कोई भी उन्हें जबरदस्ती बाहर नहीं ले जा सकता । अब वह अत्याधिक बच्चे पैदा करने के बोझ से मुक्त हो चुकी हैं । हर वक्त गर्भ धारण की परिस्थिति से भी वह स्वतंत्र हो चुकी हैं । अब कोई भी मुल्ला उनके जीवन का नियंता नहीं । परन्तु हमारे देश के मार्क्सवादी तो मुल्लाओं के ही वश में हैं । मंसूर हबीबुल्ला जैसे कट्टर मार्क्सवादी भी मुल्लाओं के अधीन मियाओं को प्रसन्न करने के लिए मक्का गए हज करके हाजी बने । 
हे अल्लाह ! तुमने हमारे लिए कही भी शांति व अवसर का नहीं छोड़ा । हमारे प्रति तुम्हारी सदा ही उदासीनता और उपेक्षा बनी ही रहीं । अनन्त यातनाओं में हमारे दिन व रात बीतते हैं । संसार की सभ्यतांए कई कुप्रथाओं को छोड़कर उन्नति की मंजिल की ओर बढ़ती रहीं पर हम जस की तस वहीं की वहीं बैठी रहीं । यहां तक की हिन्दू समान ने सती प्रथा जैसी वीभत्स प्रथा को समाप्त कर दिया । बाल विवाह व वृद्ध कें साथ विवाह की प्रथा को भी समाप्त करने के लिए कानूनी जामा पहना दिया है । समय के प्रभाव से सभी अमानवीय प्रथाएं समाप्त हो गयी हैं । पर हमारे मुस्लिम महिलाओं के लिए तो कुछ भी नहीं हुआ । हमारे मुस्लिम समाज में भी परिवर्तन तो घटित हुए हैं पर सब पुरुषों की अनुकूलता के लिए ही । ईराक में बसरा के पास एक गांव था जो खोजियों ( हिजड़ा ) युवकों के लिए प्रसिद्ध था । खोजी लोग ज्यादा तर नौजवान किशोर होते थे जो अप्राकृतिक व अमानवीय तरीके से खोजी बनाए जाते थे । इस अवैज्ञानिक प्रक्रिया में में ६० लड़के मृत्यु को प्राप्त हो जाया करते थे । ये खोजी सुल्तान धनी व बादशाहों के हरम की चौकीदारी किया करते थे ताकि हरम से स्त्रियां भाग न सकें । अब इस कातिल प्रथा का अन्त होचुका है । हम आज भी उसी कत्लगाह में रह रहीं हैं । हमारे समाज के पुरुष आज भी हमारे आंसुओं के प्रति उदासीन हैं । केवल सम्पत्तिका अधिकार देकर समझते हैं कि हमें सब कुछ दे दिया है । कितना बढ़िया है यह सम्पत्ति का अधिकार जबकि हमारा निकाह आज भी अनिश्चित है । यह संपत्ति का अधिकार हमें तलाक से कितनी निजात दिला सकता है । मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण मुस्लिम महिला का जीवन लांछनमय हो गया है । उत्तर भारत के प्रख्यात पत्रकार मुजफ्‌फर हुसैन ने लिखा है तलाक तलाक तलाक के नाम से एक फिल्म हिन्दी भाषा में तैयार हो रही थी हमारे मियांओं ने फिल्म के शीर्षक को लेकर आपत्ति प्रकट की और फिल्म का नाम बदलकर निकाह कर दिया गया । अब आपको बताते है कि फिल्म का नाम बदलने के लिए कौन से कारण बताए गए । मियांओं ने यह कहा कि मानों जब मियांजी फिल्म देख कर घर लौटे और बीवी ने पूछ लिया कि कौन सी फिल्म देख कर आए हो । जवाब में मियां जी ने कहा तलाक तलाक तलाक । तो तीन शब्दों में बीवी का जीवन हलाक हो जाएगा । अजीव तमाशा है फिल्म का नाम भी बताने पर मुस्लिम महिला कष्टमय जीवन बिताने पर मजबूर हो जाएगी । 
ईरान में खुमैनी के शासन में सैकड़ों महिलाओं की हत्या कर दी गयी  उनका अपराध क्या  केवल खुमैनी के मुस्लिम शासन के विरुद्ध थोड़ी सी जुबान खोलना बस इसी कारण इस्लाम के नाम पर उनको नरकपूर्ण जीवन बिताने पर मजबूर होना पड़ा । सैकड़ों महिलाऒं ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी । क्योंकि इस्लाम में इस्लाम के विरुद्ध बोलने का हक किसी को नहीं है । विष्णु उपाध्याय ने इस घटना के बाबत आजकल समाचारपत्र में लिखा परन्तु आज तक एक भी शब्द मुस्लिम जगत नहीं बोला । यदि अन्य समाज की महिलाओं के साथ बलात्कार होता है तो समाचार पत्र उसकी चीख पुकार से काले को उठते हैं । एक आंधी एक तूफान एक हलचल सी मच जाती है ऐसी घटना के विरुद्ध । पर इस्लाम का अर्थ तो शान्ति चुपचाप खामोशी से सब देखना है । ओ अल्लाह ! तुम ही हमारा करुण क्रंदन सुनो । तुम्हें न कहें तो किसे कहें  कौन सी दर पर दरवाजा खटखटाएं  तुमने हमारे लिए कोई सुख का अवसर क्यों न छोड़ा । धनी घर में बेगमें बनें तो असंख्य सौतों के बीच में विलास का साधन बनकर रह जांए । ईर्ष्या और प्रतिद्वदिता का जीवन जिएं । अगर गरीब घर में पहुंचे तो दिन रात जी तोड़ कमर तोड़ मजदूरी और उस पर भी हर साल संतान पैदा करना । पूरे समय गर्भ धारण करना यही हमारे भाग्य में लिखा है । गरीब घर की बेगम बनकर हमारी तकदीर में तलाक की तलवार जिधर भी जाएं लटकी ही रहती है । इस तलाक से हमारे बच्चे भी भिखारी बनकर या अपराधी बनकर दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाते हैं । हावड़ा स्टेशन के आस पास ऐसी ही परित्यक्ता महिलांए व उनके बच्चों की भीड़ देखी जा सकती है । वहां पर दाड़ी वाले मुल्ला जी की उपस्थिति भी इसीलिए होती है ताकि वह देखता रहे कि इन महिलाओं व बच्चों ने इस्लाम तो नहीं छोड़ा । उन दाड़ी वाले मुल्ला का उनके स्वास्थ्य से कोई लेना देना नहीं । वह अच्छे इंसान बनते हैं या नहीं उससे भी मुल्ला जी का कोई सरोकार नहीं । हे अल्लाह ! मुस्लिम स्त्रियों की जिन्दगी में दुख वेदना हताशा व दरिद्रता के सिवाय कुछ नहीं बचता । उनके पास आंसुओं की सम्पत्ति  चुपचाप सिसकने की इजाजत के सिवा कुछ भी नहीं । इसी से ऐ अल्लाह ! हमें रोने दो  शान्ति से रोने दो तब तक रोने दो जब तक हम मौत को प्राप्त नहीं होतीं । अल्लाह कृपया हमें अकेला ही छोड़ दो । 




Monday, March 28, 2011

ये आतंकवाद की आग बुझाएंगे या भड़काएंगे



 
-डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन    Represent: Dr. Santosh Rai
 
 
देवबन्द में पिछले दिनों तथाकथित उलेमाओं की बहुचर्चित गोष्ठी द्वारा आतंकवाद को गैर-इस्लामिक घोषित करना कितना खोखला है यह उनकी घोषणा के वाक्यों से ही स्पष्ट है। जेल में बन्द मसुलमानों को अविलम्ब छोड़ने की मांग न केवल आतंकवादियों को समर्थन देती हुई दिखाई देती है अपितु भारतीय न्यायव्यवस्था व कार्यपालिका में उनके अविश्वास को भी दर्शाती है। सेक्युलर बिरादरी के कुछ पत्रकारों और राजनीतिज्ञों ने इस घोषणा का पुरजोर स्वागत किया और ऐसा दिखाया कि मानो अब आतंकवाद के दिन गिनती के बचे हैं। परन्तु जो प्रबुद्ध वर्ग शब्दों के छलावे में न आकर उनकी करनी को देखता है उन्हें इन घोषणाओं की यथार्थता पर आशंका थी जिसको बाद के घटनाक्रम ने सही सिद्ध कर दिया। क्या उन्होंने एक भी आतंकवादी को इस्लाम के बाहर किया? क्या उन्होंने एक भी आतंकवादी को गैर इस्लामिक घोषित किया क्या कश्मी में तथा अन्य आतंकी घटनाओं के शिकार हिन्दुओं के प्रति कोई संवेदना प्रकट की गई वास्तव में जेहाद शब्द की असलियत आम जनता के सामने परत-दर-परत खुलती जा रही है। इस्लामिक दर्शन के प्रति सभी वर्गों में एक आशंका निर्माण होती जा रही है। शायद इसलिए इस सम्मेलन का आयोजन किया गया जिससे इस्लाम के प्रति और नफरत न फैले तथा आतंकवादियों को समर्थन देने की कीमत न चुकानी पड़े। इस्लाम के जानकार इस प्रयास को जेहाद का ही एक प्रकार बताते हुए इसे जेहाद-बिल-कलम का नाम देते हैं जिसके अंतर्गत छद्मवेश में जेहाद के प्रति समर्थन निर्माण किया जाता है और इसका विरोध् करने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है। 
जेहाद-बिल-कलम की आग की तपिश के लेखक को उर्दू प्रैस क्लब द्वारा प्रेस क्लब नई दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में जाकर महसूस हुई। २८ पफरवरी २००८ को तारिक नामक एक व्यक्ति ने माननीय विष्णुहरि डालमिया जैसे बड़े नामों का उल्लेख करते हुए २ मार्च २००८ को आयोजित इस कथित सेमिनार में आने का निमंत्रण दिया। इसका विषय बताया गया फासिज्म और आतंकवाद - एक सिक्के के दो पहलू भारतीय राजनीति में कुछ शब्दों का प्रयोग मनमाने अर्थों में होने लगा है। वामपंथी इस कला के हमेशा माहिर रहे हैं। फासिज्म शब्द भी ऐसा ही है जिसे जानबूझ कर वामपंथी अपने विरोधियों विशेषतया हिन्दू संगठनों के लिए प्रयोग करते हैं। विषय सुनकर ध्यान में आ गया था कि इस तथाकथित गोष्ठी में आतंकवाद को हिन्दुओं के कार्यों की प्रतिक्रिया रूप में प्रस्तुत करने का ही प्रयास किया जाएगा। परन्तु प्रैस क्लब नई दिल्ली का स्थान व माननीय डालमिया जी जैसों का नाम इससे ऐसा लगा कि इस कार्यक्रम में कुछ प्रबुद्ध लोग भी होंगे। परन्तु इस कार्यक्रम में जाकर महसूस हुआ कि यह कार्यक्रम मेरी आशंका के अनुरूप ही था। दर्शकों में अधिकांश मुस्लिम समाज के ही लोग थे। उनकी वेशभूषा व तेवर देखकर उनके इरादे समझ में आने लगे थे। डालमिया जी स्वास्थ्य अनुकूल न होने की वजह से नहीं आ सके। बाद के घटनाक्रम ने सिद्ध कर दिया कि उनका न आना अच्छा ही रहा। मैं थोड़ा विलंब से पहुँचा था परन्तु वहाँ जाकर मालूम चला कि पूर्व वक्ताओं ने हिन्दू संगठनों के विरुद्ध विषवमन ही किया। मेरे वहाँ पहँचते ही तथाकथित मानवाधिकारवादी लेखिका अरुन्धति राय को बोलने के लिए निमंत्रिात किया गया। कभी तस्लीमा नसरीन के पक्ष में बोलने वाली अरुन्धति ने वहाँ पर मुस्लिम समाज को सलाह दी कि वे तस्लीमा पर अपना समय बर्बाद न करें उसका कोई असर नहीं है। इसके बाद श्रोताओं का मूड भाँपकर उन्होंने अफजल गुरु मामले पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय पर निशाने साधने शुरू कर दिए। उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उनके पास अपफजल गुरु को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं है। इसके बावजूद समाज में व्याप्त धारणा के आधर पर उसकी फांसी की सजा बरकरार रखी जाती है। यह सब जानते हैं कि उनका यह कथन पूर्ण असत्य था। इसके बावजूद आयोजकों ने टोका नहीं अपितु श्रोताओं ने ताली बजाकर उनके इस कथन का स्वागत किया। तभी मंच से एक आवाज आई, शेम ! शेम!!। किस पर शर्म आ रही थी तभी गिलानी नामक व्यक्ति को जो संसद पर हमले में आरोपी था और सबूतों के अभाव में माननीय न्यायालय ने संदेह का लाभ देकर उसे छोड़ दिया था आमंत्रित किया गया। भरपूर तालियों से उसका स्वागत किया गया। उसके भाषण का सार भी यही था कि भारत में न तो कोई कानून है और न कोई प्रजातंत्र। यहाँ हमेशा से मुस्लिम समाज का शोषण हुआ है और अगर कुछ युवक हताश होकर हथियार उठाते हैं तो इसमें क्या गलत है प्रैस क्लब जैसे स्थान पर माननीय सुप्रीम कोर्ट संसद प्रजातंत्र, कार्यपालिका मीडिया सब पर इस प्रकार प्रहार होंगे और आतंकवाद को उचित ठहराया जाएगा तथा इसका कोई विरोध् भी नहीं करेगा यह सोचा नहीं जा सकता। इसके बाद प्रसिद्ध पत्राकार मनोज रघुवंशी को निमंत्रित किया गया। उन्होंने आतंकवाद को उचित ठहराने के प्रयास की जैसे ही निन्दा की श्रोताओं ने शोर मचाना शुरू कर दिया। बड़ी मुश्किल से वह ये बात कह पाए कि जेहाद के समर्थकों को यह सोचना चाहिए कि यह उनके ही खिलाफ जाएगा। वे अत्याचारों की झूठी कहानियों के आधर पर आतंकवाद को उचित ठहरा रहे हैं तो आतंकवादियों द्वारा मारे गए व्यक्तियों के परिवार को हथियार उठाने से कोन रोक सकेगा और इसके क्या परिणाम होंगे। 
अब किन्हीं हुसैन साहब को बोलने के लिए बुलाया गया। उन्होंने आते ही हिन्दुओं के पवित्रा ग्रंथ महाभारत और रामायण पर हमले बोलने शुरू कर दिए। आयोजकों द्वारा न रोकने और श्रोताओं द्वारा उत्साहित करने पर अब उन्होंने भगवान राम पर आक्रमण किया और अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए एक भड़काने वाला और हिन्दुओं की धर्मिक आस्थाओं पर आघात करने वाला भाषण दिया। उन्होंने कहा रावण का अपराध् यही था कि उसने राम की सीता का अपहरण किया। यह किसी ने नहीं देखा कि उसने सीता के साथ कुछ किया या नहीं। इसके बावजूद एक सेना का यहां तक कि बन्दरों की सेना का भी गठन किया और लंका पर चढ़ाई कर मासूम लंकावासियों को मारा तथा लंका जला दी। राम भी एक युद्ध प्रेमी व्यक्ति थे। उनके भाषण के अंत में भी किसी ने कुछ नहीं बोला। तब मुझे बोलने के लिए बहुत ही हल्के ढंग से आमंत्रित किया गया। अब तक अरुन्धति राय को समझ में आ गया था कि मेरे बोलते ही क्या हो सकता है। इसलिए वह प्रैस क्लब छोड़कर चल दी। मैं जैसे ही बोलने के लिए खड़ा हुआ श्रोतओं ने शोर मचाना शुरू कर दिया। मैंने माननीय न्यायपालिका, भारतीय प्रजातंत्रा भारतीय संसद पर हमला करने व आतंकवाद का समर्थन करने का प्रतिवाद किया और कहा कि जिस प्रकार के शब्द भगवान्‌ राम के प्रति प्रयोग किए गए अगर वैसे ही मोहम्मद पैगम्बर साहब के बारे में बोले जाएंगे तो उन्हें कैसा लगेगा। रंगीला रसूल नामक पुस्तक की अगर एक भी घटना कोई रख देगा तो क्या वे बर्दाश्त कर पाएंगे इतना सुनते ही श्रोता व मंच दोनों ही भड़क गए। १५-२० आदमी मेरे को मारने को लपके ३ व्यक्तियों ने मुझे जान से मारने की धमकी दी। एक व्यक्ति ने यहाँ तक कहा वह ६ दिसम्बर के बाद १० हिन्दू मार चुका है ११वां नम्बर अब तेरा है। तब वहाँ पर उपस्थित एक हिन्दू पत्रकार ने मुझे ही लानत भेजनी शुरू कर दी और वहाँ की जेहादी भीड़ को खुश करने के लिए मेरे व हिन्दू संगठनों के प्रति अपशब्दों का प्रयोग करना शुरू कर दिया। तब तक वहाँ पुलिस बुला ली गई और कापफी मुश्किल के बाद मैं सुरक्षित बाहर आ सका। इस गोष्ठी में फासिज्म और आतंकवाद पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हुई। परन्तु दोनों क्या हैं यह वहाँ पर उपस्थित व्यक्तियों को समझ में आ गया होगा। दोनों का नंगा रूप वहाँ देखने को मिला। दोनों में ही असहमति को कुचला जाता है। पफासीवाद में सत्ता का आतंक होता है जबकि आतंकवाद में कुछ संगठनों का। यहाँ पर  सत्तासीन  आयोजकों और जेहादी जनता का आतंकवाद खुलकर देखने को मिला। 
मैं बाहर तो आ गया परन्तु कुछ यक्ष प्रश्न मेरे सामने खड़े हो गए :- 
१. यह एक गोष्ठी थी या जेहादियों का जमावड़ा
२. क्या इसी को जेहादी-बिल-कलम कहते हैं 
३. क्या संपूर्ण भारत में मानवाधिकारवादियों व सेक्युलरवादियों का आतंकवादियों के साथ इसी प्रकार का गठजोड़ है जैसा यहाँ देखने को मिला 
४. क्या प्रैस क्लब जैसे महत्वूपर्ण स्थान को आतंकवादियों के समर्थन व सर्वोच्च न्यायालय पर हमले के लिए दुरुपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए  
५. क्या केवल मुस्लिम समाज की आस्थाएं ही महत्त्वपूर्ण हैं जो केवल एक पुस्तक का नाम लेने से आहत हो जाती हैं और वे मारने पर उतारू हो जाते हैं  
६. क्या हिन्दू समाज की आस्था महत्त्वपूर्ण नहीं है और भगवान राम व माता सीता के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने पर कोई कार्यवाही नहीं होनी चाहिए
७. राम के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करने व न्यायपालिका पर प्रहारों पर कथित इतिहासकार पत्रकार को केवल एक पुस्तक का नाम लेने पर अमर्यादित भाषा का प्रयोग करने का अधि कार होना चाहिए 
८. क्या हिन्दू आस्थाओं पर प्रहार करने पर मौन रहना परन्तु इन प्रहारों का हल्का सा प्रतिवाद करने पर भी हमला बोलना क्या यही भारत में प्रगतिशील व पंथनिरपेक्ष कहलाने की एकमात्र कसौटी है  
९. प्रैस क्लब जैसे स्थान के एक कक्ष में बहुमत होने के कारण वे अपने विपरीत विचार रखने वाले व्यक्ति को मारने का प्रयास कर सकते हैं तो अगर प्रजातांत्रिक विवशता के कारण दुर्भाग्य से उनकी संख्या अध्कि हो जाती तो क्या वे गैर- मुसलमानों का वही हाल नहीं करेंगे जो पाकिस्तान, बंग्लादेश इंडोनेशिया तथा मलयेशिया में हो रहा है 
ऐसे और कई यक्ष प्रश्न मेरे सामने हैं जिनका जवाब मैं नहीं ढूंढ पा रहा हूँ। अब मैं इन यक्ष प्रश्नों को भारत की प्रबुद्ध जनता के समक्ष प्रस्तुत करता हूँ। 
Courtesy:www.hindusthangarurav.com